बाजपेयी जी की कचौड़ी: एक दोना, दो कचौड़ियाँ और पूरा लखनऊ

— मोहित धवन

किसी शहर की पहचान सिर्फ़ उसके स्मारकों से नहीं होती, उसकी सुबहों से भी होती है। लखनऊ की सुबह का अपना अलग ही मिज़ाज है। कहीं गोमती किनारे टहलते लोग, कहीं कुल्हड़ की चाय से उठती भाप, कहीं अख़बार हाथ में लिए बुज़ुर्ग… और इन्हीं सबके बीच हज़रतगंज की एक ऐसी खुशबू, जो दशकों से लोगों को अपनी ओर खींचती चली आ रही है—बाजपेयी कचौड़ी भंडार की गरमागरम कचौड़ियाँ।

लखनऊ में एक कहावत-सी सुनने को मिलती है—“हुज़ूर, शहर को समझना है तो उसकी रसोई तक जाइए।” शायद यही वजह है कि इस शहर की पहचान सिर्फ़ टुंडे के कबाब या मक्खन मलाई तक सीमित नहीं है। सुबह के लखनऊ की अपनी एक अलग थाली है, और उस थाली का सबसे आत्मीय स्वाद है—बाजपेयी जी की गरमागरम कचौड़ी।

साल 1995। नौकरी के सिलसिले में पहली बार लखनऊ आया था। जेब में कुछ सपने थे, हाथ में एक छोटा-सा बैग और मन में एक अनजान शहर को अपनाने की उत्सुकता। उन दिनों शहरों को गूगल नहीं, लोग समझाते थे।

ऑफिस के एक वरिष्ठ साथी ने कहा, “मोहित जी, किसी सुबह हज़रतगंज जाइए। वहाँ बाजपेयी जी की कचौड़ी खाइए। लखनऊ आपको अपना परिचय खुद दे देगा।”

दूसरे दिन सुबह मैं हज़रतगंज पहुँच गया।

दुकान खुल चुकी थी और कढ़ाही में कचौड़ियाँ छन रही थीं। गरम तेल की छन-छन, मसालों की महक और लोगों की हल्की-फुल्की बातचीत मिलकर एक ऐसा दृश्य बना रही थीं, जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना आसान नहीं। वहाँ कोई आलीशान रेस्तराँ नहीं था। न वातानुकूलित हॉल, न आरामदेह कुर्सियाँ। लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, लेकिन किसी को शिकायत नहीं थी।

एक कागज़ हाथ में थमाया गया। उसके ऊपर रखा था दोना। दोने में दो गरमागरम खस्ता कचौड़ियाँ, साथ में 25 मसालों से तैयार आलू की रसेदार, हल्की तीखी सब्ज़ी, काबुली चने और थोड़ा-सा अचार।

बस… इतना ही।

लेकिन कई बार “बस इतना ही” जीवन भर के लिए काफ़ी हो जाता है।

पहला कौर मुँह में गया तो लगा, जैसे मसालों का स्वाद नहीं, लखनऊ का अपनापन ज़ुबान पर उतर आया हो। चनों की गहराई, आलू की सब्ज़ी का अनोखा स्वाद और मसालों का संतुलन ऐसा कि तीखापन स्वाद पर हावी नहीं होता, बल्कि उसे और यादगार बना देता है।

उसी क्षण मन ने कहा—

“वाह जनाब… यही तो है लखनऊ।”

उस दिन मुझे एहसास हुआ कि किसी शहर से रिश्ता हमेशा बड़ी घटनाओं से नहीं बनता। कभी-कभी एक दोना कचौड़ी भी उम्र भर का अपनापन दे जाती है।

दरअसल, बाजपेयी कचौड़ी भंडार सिर्फ़ एक दुकान नहीं, बल्कि लखनऊ की लगभग आधी सदी पुरानी विरासत है। इसकी शुरुआत वर्ष 1974 में स्वर्गीय बालकिशन बाजपेयी और उनकी पत्नी शांति बाजपेयी ने की थी। उस समय बालकिशन बाजपेयी आटे की चक्की चलाते थे, जबकि शांति बाजपेयी घर पर मसालेदार कचौड़ियाँ और आलू की सब्ज़ी तैयार करती थीं। दोनों ने हज़रतगंज में एक पेड़ के नीचे मात्र 150 रुपये मासिक किराए पर इस छोटे-से सफ़र की शुरुआत की। किसी ने शायद तब नहीं सोचा होगा कि यही ठेला आगे चलकर लखनऊ की पहचान बन जाएगा।

आज इस दुकान को परिवार की तीसरी पीढ़ी संभाल रही है। वर्षों बाद भी स्वाद की वही निरंतरता इसकी सबसे बड़ी पहचान है। खासकर 25 अलग-अलग मसालों से तैयार होने वाली आलू की सब्ज़ी आज भी लोगों को दूर-दूर से यहाँ खींच लाती है। यही कारण है कि देश ही नहीं, विदेशों से आने वाले पर्यटक भी हज़रतगंज पहुँचकर इस स्वाद का अनुभव करना नहीं भूलते।

तीन दशक बीत चुके हैं।

बीच के वर्षों में न जाने कितने शहर देखे, कितने होटल, कितने रेस्तराँ और कितने नामचीन स्वाद। लेकिन जब भी लखनऊ लौटता हूँ, मन सबसे पहले हज़रतगंज की उसी दुकान की ओर खिंच जाता है।

आज भी सुबह का वही नज़ारा मिलता है।

एक ओर दफ़्तर जाने की जल्दी में खड़ा युवक दो मिनट में अपना दोना ख़त्म कर रहा है। दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग आराम से हर कौर का स्वाद ले रहे हैं। पास ही एक पिता अपने छोटे बेटे से कह रहे हैं, “धीरे खाओ बेटा… गरम है।” कुछ कॉलेज के छात्र हँसी-मज़ाक करते हुए दूसरी बार लाइन में लग चुके हैं। कोई किसी को नहीं जानता, फिर भी माहौल ऐसा कि सब अपने लगते हैं।

यही तो लखनऊ है।

यहाँ अनजान चेहरों के बीच भी अपनापन मिल जाता है।

हज़रतगंज की “गंजिंग” का ज़िक्र अक्सर होता है। लेकिन मेरे लिए गंजिंग का मतलब सिर्फ़ सड़क पर टहलना नहीं है। गंजिंग तब पूरी होती है, जब हाथ में बाजपेयी जी की कचौड़ी का दोना हो और सामने से आती हवा में मसालेदार आलू की सब्ज़ी की महक घुल रही हो।

मैंने एक बार वहीं खड़े-खड़े एक पुराने ग्राहक से यूँ ही पूछ लिया, “आप कब से आ रहे हैं यहाँ?”

उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, “इतना याद नहीं… लेकिन जब मेरे पिता मुझे उँगली पकड़कर यहाँ लाते थे, तब मैं दो कचौड़ियाँ भी पूरी नहीं खा पाता था। अब पोते को लेकर आता हूँ।”

उस एक वाक्य ने बता दिया कि बाजपेयी जी की कचौड़ी केवल नाश्ते की दुकान नहीं, पीढ़ियों के बीच चलती आ रही एक परंपरा है।

आज के दौर में चमकदार कैफ़े हैं, विदेशी व्यंजन हैं और सोशल मीडिया पर रोज़ नए-नए फ़ूड ट्रेंड हैं। लेकिन बाजपेयी कचौड़ी भंडार ने कभी अपने स्वरूप को बदलने की कोशिश नहीं की। शायद इसलिए कि उसे पता है—विश्वास का कोई आधुनिक विकल्प नहीं होता।

सुबह से शुरू होने वाली यह रौनक शाम तक धीरे-धीरे थम जाती है। कढ़ाही की आँच मंद पड़ जाती है, लेकिन दिन भर वहाँ से गुज़रने वाले सैकड़ों लोगों के साथ लखनऊ का एक स्वाद घर तक चला जाता है।

आज जब 1995 की उस पहली सुबह को याद करता हूँ, तो महसूस होता है कि मैंने उस दिन सिर्फ़ दो कचौड़ियाँ नहीं खाई थीं। मैंने लखनऊ की तहज़ीब का पहला कौर चखा था।

हो सकता है कि आने वाले वर्षों में हज़रतगंज और बदल जाए। नई इमारतें बनें, नए ब्रांड आएँ, नए कैफ़े खुलें। लेकिन जब तक किसी सुबह एक कागज़ पर रखा दोना, उसमें दो गरमागरम खस्ता कचौड़ियाँ और 25 मसालों वाली आलू की वही मशहूर सब्ज़ी लोगों के हाथों तक पहुँचती रहेगी, तब तक लखनऊ अपनी असली पहचान नहीं खोएगा।

क्योंकि कुछ स्वाद पेट नहीं भरते…

वे शहरों की स्मृतियों को ज़िंदा रखते हैं।

और मेरे लिए हज़रतगंज का बाजपेयी कचौड़ी भंडार सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि 1995 से आज तक चला आ रहा लखनऊ का सबसे आत्मीय सलाम है।

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