उन आँसुओं ने ज़िन्दगी का मकसद बदल दिया

44 बार रक्तदान, भूखों को भोजन और लावारिसों की सेवा—अभिषेक सिंह की प्रेरक कहानी

लेखक : राज खन्ना

कुछ लोग गीत केवल गुनगुनाते हैं, कुछ लोग उन्हें जीते हैं। सुल्तानपुर के युवा अभिषेक सिंह उन लोगों में हैं जिन्होंने मानवता को अपने जीवन का धर्म बना लिया है।

वर्ष 2014 में ग्रामीण परिवेश से निकलकर अभिषेक बी.एससी. की पढ़ाई के लिए कमला नेहरू इंस्टीट्यूट (के.एन.आई.), सुल्तानपुर पहुँचे। कॉलेज में आयोजित एक रक्तदान शिविर में उन्होंने पहली बार प्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित मरीज राजन के लिए रक्तदान किया। रक्त मिलने के बाद मरीज के पिता की आँखों से छलकते कृतज्ञता के आँसू अभिषेक के मन पर ऐसी अमिट छाप छोड़ गए कि उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं होगा।

इसी दौरान गोमती नदी के पुल से गुजरते हुए उनकी नज़र किनारे बैठे एक वृद्ध पर पड़ी। वृद्ध ने केवल पानी माँगा। बातचीत में पता चला कि तीन दिन से उसके पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं गया था। शरीर पर खुले घाव थे, जिनमें कीड़े पड़ चुके थे। उस दृश्य ने अभिषेक को भीतर तक झकझोर दिया। वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने निःस्वार्थ सेवा को अपना संकल्प बना लिया।

आज उस घटना को ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं। अब 28 वर्षीय अभिषेक 44 बार रक्तदान कर चुके हैं। लेकिन उनकी सेवा केवल रक्तदान तक सीमित नहीं रही। उनका प्रयास है कि शहर में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। वर्षों से वे “वन डे हंगर स्ट्राइक” अभियान चला रहे हैं। सड़कों, रेलवे स्टेशनों, फुटपाथों और खुले आसमान के नीचे रहने वाले भूखे, बीमार और लावारिस लोगों तक भोजन पहुँचाना, उन्हें नहलाना-धुलाना, साफ कपड़े पहनाना, घावों की सफाई करना, अस्पताल में भर्ती कराना और उनके स्वस्थ होने तक देखभाल करना अब उनके जीवन की दिनचर्या बन चुकी है। यदि किसी जरूरतमंद की पहचान मिल जाती है तो उसे उसके परिवार तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाता है।

सेवा का यह सफर किसी एक दिन के उत्साह का परिणाम नहीं है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, अभिषेक और उनके साथी मदद की हर सूचना पर बिना देर किए पहुँच जाते हैं। ऐसे समय में, जब समाज का दायरा अक्सर अपने परिवार तक सिमटता जा रहा है, अभिषेक जैसे युवा उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आते हैं।

अभिषेक के जीवन में कई प्रेरणास्रोत भी रहे। के.एन.आई. में रक्तदान शिविर का आयोजन विधि विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार सिंह ने किया था, जो स्वयं अब तक 57 बार रक्तदान कर चुके हैं। समाजसेवी डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव 75 बार रक्तदान कर चुके हैं, जबकि करतार केशव यादव चार दशकों से सेवा कार्यों में सक्रिय रहते हुए 40 बार रक्तदान कर चुके हैं। इन सभी के व्यक्तित्व और सेवा भावना ने अभिषेक के भीतर मानवता के प्रति समर्पण को और मजबूत किया।

डेढ़ वर्ष पहले अभिषेक का विवाह शिवानी से हुआ। शिवानी भी उसी सेवा पथ की सहभागी हैं। उन्होंने सगाई के अवसर पर रक्तदान किया और विवाह के बाद भी दो बार रक्तदान कर चुकी हैं। उनके लिए वैवाहिक जीवन केवल साथ रहने का नहीं, बल्कि साथ मिलकर समाज के लिए जीने का संकल्प है।

आज अभिषेक और उनके साथी सुल्तानपुर के सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, रेलवे स्टेशन और शहर की सड़कों पर पड़े उन लोगों की सेवा कर रहे हैं, जिनका कोई अपना नहीं है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी याददाश्त खो दी है, मानसिक संतुलन खो चुके हैं या परिवार द्वारा छोड़ दिए गए हैं। उनके पास न भोजन है, न रहने का ठिकाना और न उपचार की कोई व्यवस्था। कई लोगों के घावों में कीड़े पड़ चुके होते हैं। दर्द उनकी संवेदनाओं को सुन्न कर चुका होता है।

अभिषेक के साथ प्रज्ज्वल, अनिमेष, विपिन अनुज, निशांत, अभिषेक सोनी सहित कई युवा समाजसेवी डॉ. सुधाकर सिंह, अंकुरण फाउंडेशन और गायत्री परिवार के सहयोग से इस सेवा अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।

उनकी सेवा यात्रा की अनेक कहानियाँ मन को द्रवित कर देती हैं। जिला अस्पताल के सेप्टिक वार्ड में भर्ती एक वृद्ध महिला दो वर्षों तक अभिषेक की प्रतीक्षा करती थीं। वह उनके हाथों से ही भोजन करती थीं। उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार भी अभिषेक और उनके साथियों ने ही किया। बिहार के सीतामढ़ी निवासी राजेश्वर सिंह गंभीर अवस्था में मिले। महीनों की सेवा के बाद स्वस्थ हुए और अपने घर लौट सके। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर निवासी शीतल और मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी केशव सहित अनेक लोगों को भी उन्होंने नया जीवन दिया। कई लोगों के नाम दर्ज हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक ऐसे लोग हैं जिनकी कोई पहचान नहीं। सेवा करने वालों के लिए उनकी पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उनका जीवन है।

ऐसे लोगों की सेवा आसान नहीं होती। कई लोग बातचीत तक नहीं करते। कुछ भोजन लेने से भी इनकार कर देते हैं। विश्वास जीतने में कई दिन लग जाते हैं। घावों की सफाई और मरहम-पट्टी करते समय वे कभी-कभी नाराज़ भी हो जाते हैं। लेकिन अभिषेक और उनके साथी धैर्य नहीं खोते। वे रोज़ उन्हें खोजते हैं, उनके उपचार का ध्यान रखते हैं और तब तक प्रयास करते हैं जब तक वे स्वस्थ न हो जाएँ। यदि कोई अपने घर का पता बता देता है तो उसे परिवार तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाता है।

पिछले तीन वर्षों से अभिषेक की टीम “वन डे हंगर स्ट्राइक” अभियान चला रही है। लोगों से अपील की जाती है कि वे महीने में एक समय उपवास रखें और उस भोजन पर होने वाला लगभग पचास रुपये का खर्च इस अभियान को दें। इस पहल को समाज का भरपूर सहयोग मिला है। अनेक परिवार अपने घर के शुभ अवसरों पर भी इस अभियान के लिए सहयोग राशि देने लगे हैं। हर शाम युवा स्वयंसेवक शहर के विभिन्न इलाकों में जरूरतमंदों की पहचान करते हैं और ढाबों से भोजन पैक कराकर उनके बीच वितरित करते हैं।

अभिषेक कहते हैं कि समाज में सहयोग करने वालों की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता केवल भरोसा जीतने की होती है। यदि नीयत साफ हो और प्रयास ईमानदार हों तो लोग स्वयं आगे आकर साथ खड़े होते हैं। यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

मानवता के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश रत्न और रक्तयोद्धा सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान किसी असहाय व्यक्ति के चेहरे पर लौटती मुस्कान है।

सच तो यह है कि अभिषेक सिंह केवल यह गीत गुनगुनाते नहीं—

“किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो अपने दिल में प्यार…”

उन्होंने इसे अपने जीवन का आचरण बना लिया है। उनसे एक बार मिलिए, संभव है कि मानवता पर आपका विश्वास और गहरा हो जाए..

लेखक परिचय :

राज खन्ना हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ और सम्मानित हस्ताक्षरों में से एक हैं। पिछले लगभग पाँच दशकों से वे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों में निरंतर लेखन कर रहे हैं। सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं, समसामयिक विषयों और जीवन-मूल्यों पर उनकी लेखनी ने पाठकों के बीच एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

तथ्यों की प्रामाणिकता, संवेदनशील दृष्टि और सहज अभिव्यक्ति उनकी लेखन शैली की विशेषता रही है। यही कारण है कि देशभर में उनका एक बड़ा और समर्पित पाठक वर्ग है, जो वर्षों से उनके लेखों को विश्वास और आत्मीयता के साथ पढ़ता आया है। हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान नई पीढ़ी के लेखकों और पत्रकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

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