संपादकीय

लोकतंत्र की खामोशी और एक अनशन का शोर

लेखक : मोहित धवन
दिनांक : 24 जुलाई, 2026

लोकतंत्र की विडंबना देखिए। जिस व्यवस्था का जन्म जनता की आवाज़ सुनने के लिए हुआ था, उसी व्यवस्था में आज जनता को अपनी आवाज़ सुनाने के लिए अनशन करना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। असली सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र अब केवल तब जागता है, जब कोई नागरिक अपने शरीर को ही प्रतिरोध का अंतिम माध्यम बना ले?

जंतर-मंतर पर बैठा एक व्यक्ति केवल उपवास नहीं कर रहा था। वह इस लोकतंत्र के सामने एक आईना रखे बैठा था। उस आईने में केवल सरकार का चेहरा नहीं दिख रहा था; उसमें संसद, राजनीतिक दल, नौकरशाही, न्याय व्यवस्था, मीडिया और हम सब दिखाई दे रहे थे। फर्क बस इतना था कि उस आईने में झाँकने का साहस बहुत कम लोगों ने किया।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद मानी जाती है। लेकिन यदि संवाद का दरवाज़ा तब खुलता है, जब किसी की साँसें दाँव पर लग जाएँ, तो इसे लोकतंत्र की परिपक्वता नहीं कहा जा सकता। तब यह मान लेना चाहिए कि कहीं न कहीं संवाद की संस्थाएँ केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं।

यह केवल सोनम वांगचुक का प्रश्न नहीं है। कभी किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठते हैं, कभी छात्र सड़कों पर उतरते हैं, कभी बेरोज़गार युवा रेल की पटरियों पर अपना भविष्य खोजते दिखाई देते हैं। हर बार व्यवस्था कुछ दिन असहज होती है, फिर आश्वासनों का एक नया पुल बना दिया जाता है। लेकिन पुल के नीचे बह रही असंतोष की नदी वहीं की वहीं रहती है।

लोकतंत्र में विरोध समस्या नहीं होता, विरोध की अनसुनी समस्या होती है।

सवाल यह भी नहीं कि सरकार सही है या आंदोलन। सवाल यह है कि क्या हमने लोकतंत्र को केवल बहुमत की गणित तक सीमित कर दिया है? क्या पाँच वर्ष में एक बार मतदान कर देना ही नागरिक होने का प्रमाणपत्र है? क्या उसके बाद प्रश्न पूछना असुविधाजनक और उत्तर देना राजनीतिक जोखिम बन गया है?

लोकतंत्र का संकट तब शुरू होता है, जब सत्ता आलोचना को सलाह नहीं, चुनौती समझने लगे और समाज असहमति को राष्ट्र-विरोध का पर्याय बना दे। उस दिन लोकतंत्र बाहर से नहीं टूटता, भीतर से खोखला होने लगता है।

यह भी उतना ही सच है कि हर समस्या का समाधान सरकार के पास नहीं हो सकता। हर युवा को सरकारी नौकरी देना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को जीवन के लिए तैयार कर रही है या केवल परीक्षाओं के लिए? हमने डिग्रियों का अंबार तो खड़ा कर दिया, लेकिन कौशल, उद्यमिता और जीवनोपयोगी शिक्षा को अभी भी हाशिए पर रखा हुआ है।

यदि भारत को आने वाले दशकों में आत्मनिर्भर बनना है, तो रोजगार की बहस को सरकारी नियुक्तियों से आगे ले जाना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ऐसे युवाओं का निर्माण करना होगा, जो अवसर खोजने के बजाय अवसर पैदा करें। शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं, क्षमता होना चाहिए।

लेकिन शायद इससे भी बड़ा संकट हमारी विकास-दृष्टि का है।

हमने प्रकृति को संसाधन समझा, संबंध नहीं। नदियों को परियोजना, जंगलों को भूमि और पहाड़ों को खनिज में बदल दिया। विकास की दौड़ में मनुष्य प्रकृति से जितना दूर हुआ, उतना ही स्वयं से भी दूर होता गया। सोनम वांगचुक जैसे लोग बार-बार हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यता केवल ऊँची इमारतों से नहीं बनती; वह मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन से बनती है। यदि विकास पृथ्वी को घायल करके होगा, तो अंततः मनुष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

शायद अब समय केवल सरकार से अपेक्षा करने का नहीं, समाज से भी प्रश्न पूछने का है।

क्या हमने अपने बीच ऐसे नेतृत्व को तैयार किया है, जो चुनाव जीतने के लिए नहीं, समाज को दिशा देने के लिए खड़ा हो? क्या विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ बाँट रहे हैं या विचार भी पैदा कर रहे हैं? क्या उद्योग केवल लाभ कमाने तक सीमित हैं या सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने को भी तैयार हैं? क्या बुद्धिजीवी केवल बहस कर रहे हैं या समाज के बीच उतरकर संवाद भी कर रहे हैं?

हर परिवर्तन संसद से नहीं आता। कुछ परिवर्तन समाज की चेतना से जन्म लेते हैं। इतिहास में वही समाज आगे बढ़े हैं, जिन्होंने अपने भीतर ऐसे लोगों को जन्म दिया, जो सत्ता से पहले समाज को बदलने निकले।

आज लोकतंत्र को किसी नए संविधान की आवश्यकता नहीं है। उसे नए नागरिकों की आवश्यकता है। ऐसे नागरिक, जो अधिकारों के साथ अपने दायित्वों को भी समझें। ऐसे नेता, जो सत्ता से पहले समाज के प्रति जवाबदेह हों। ऐसी शिक्षा, जो केवल करियर नहीं, चरित्र भी बनाए। और ऐसा विकास, जिसमें मनुष्य, प्रकृति और अर्थव्यवस्था तीनों साथ चल सकें।

सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त हो गया है। लेकिन लोकतंत्र के सामने रखे गए प्रश्न अभी भी उपवास पर हैं।

शायद किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब वह अपने सबसे शांत, सबसे कमजोर और सबसे असुविधाजनक प्रश्न को भी उतनी ही गंभीरता से सुन सके, जितनी गंभीरता से वह चुनावी नारों को सुनता है।

और यदि किसी लोकतंत्र में प्रश्न पूछने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही हो, तो शायद समस्या प्रश्नों में नहीं, उन उत्तरों में है जो अब तक दिए ही नहीं गए।

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